मधुशाला

धोंडोपंत's picture
धोंडोपंत in जे न देखे रवी...
3 Jan 2008 - 7:42 pm

रसिकहो,
थंडीचा सुखद मोसम सुरू आहे. नववर्षाच्या पार्ट्यांना वेग आलेला आहे. वातावरण कधी नाही इतकं सुखद आहे. जीवनातील दु:खे क्षणभर का होईना विसरून एखादी चक्कर मधुशाळेत टाकावी असे वाटले तर त्यात गैर तर नाही?

आमचे आदरणीय कविवर्य श्री. हरिवंशराय बच्चन यांची मधुशाला अशा वेळेस आमचं सर्व विश्व व्यापून टाकते आणि त्या रूबाईया आमच्या भोवती गुंजारव करीत राहतात. त्यातले हे काही मधुकण.

प्रियतम ! तू मेरी हाला है,
मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू
बनता है पीनेवाला;
मैं तुझको छक छलका करता,
मस्त मुझे पी तू होता,
एक दूसरे को हम दोंनो
आज परस्पर मधुशाला ||

भावुकता - अंगूर - लता से
खींच कल्पना की हाला,
कवि बनकर हे साक़ी आया
भरकर कविता का प्याला;
कभी न कण भर ख़ाली होगा
लाख पिएं, दो लाख पिएं !
पाठकगण है पीनेवाले
पुस्तक मेरी मधुशाला ||

मदिरालय जाने को घर से
चलता है पीनेवाला,
'किस पथ से जाऊं?' असमंजस
में है वह भोला-भाला;
अलग-अलग पथ बतलावे सब,
पर मैं यह बतलाता हूं-
'राह पकड़ तू एक चलाचल
पा जाएगा मधुशाला' ||

चलने ही चलने में कितना
जीवन, हाय, बिता डाला !
'दूर अभी है' पर कहता है
हर पथ बतलानेवाला;
हिंमत है न बढूं आगे को,
साहस है न फिरूं पिछे,
किं-कर्तव्य-विमूढ़ मुझे कर
दूर खड़ी है मधुशाला ||

मुखसे तू अविरत कहता जा
मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा
एक ललित कल्पित प्याला;
ध्यान किए जा मनमें सुमधुर,
सुखकर सुंदर साक़ी का,
और बढ़ा चल पथिक न तुझको
दूर लगेगी मधुशाला ||

लाल सुरा की धार लपट-सी,
कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको
कह देना उर का छाला;
दर्द नशा है इस मदिरा का,
विगतस्मृतियां साक़ी है,
पीड़ा में आनंद जिसे हो,
आए मेरी मधुशाला ||

धर्म-ग्रंथ सब जला चुकी है
जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मस्जिद, गिरजे - सब को
तोड़ चुका जो मतवाला;
पंडित, मोमिन, पादरियों के
फंदों से जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का
स्वागत मेरी मधुशाला ||

बने पुजारी प्रेमी साक़ी
गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से
मद के प्यालों की माला,
'और लिए जा, और पिए जा'
इसी मंत्र का जाप करे,
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं,
मंदिर हो यह मधुशाला ||

बजी न मंदिर में घड़ियाली,
चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज़्ज़िन
देकर मस्जिद में ताला;
लुटे ख़ज़ाने नरपतियों के,
गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले,
खुली रही यह मधुशाला ||

हरा- भरा रहता मदिरालय,
जग पर पड़ जाए पाला,
वहां मुहर्रम का तम जाए,
यहां होलिका की ज्वाला;
स्वर्गलोक से सीधी उतरी
वसुधा पर, दुख क्या जाने !
पढ़े मर्सिया दुनिया सारी
ईद मनाती मधुशाला ||

एक बरस में एक बार ही
जगती होलीं की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी
जलती दीपों की माला;
दुनियावालों, किंतु किसी दिन
आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली,
रोज़ मनाती मधुशाला ||

आपला,
(मदिराप्रेमी) धोंडोपंत

कविताआस्वाद

प्रतिक्रिया

विसोबा खेचर's picture

4 Jan 2008 - 6:09 am | विसोबा खेचर

एक बरस में एक बार ही
जगती होलीं की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी
जलती दीपों की माला;
दुनियावालों, किंतु किसी दिन
आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली,
रोज़ मनाती मधुशाला ||

क्या बात है! अतिशय सुरेख...

आपला,
(मधुशालाप्रेमी) तात्या.

प्रकाश घाटपांडे's picture

4 Jan 2008 - 10:35 am | प्रकाश घाटपांडे

आज आख्खी "मधुशाला" वाचली. जरा "रसग्रहण" पण होउंद्या. कवितेचे हो. काही शब्द अडतात त्यामुळे सौंदर्य निसटून जाते. कविता कव्हा म्हनायच अन गझल कव्हा अजुन सुधरत न्हाई बघा.
प्रकाश घाटपांडे