भिजल्या डोळ्यासही ना काही वाटले
गालावर अमुर्त दु:ख ओघळले कोवळे
ना दिशा, ना आकार ना झंकार माहित
ओठांत अव्यक्त शब्द अडकले सगळे
सोनेरी दर्प घेवून अवतरली किरणे
मायेचा अर्क दवबिदुंत पाझरे
आसवांच्या मोत्यांची मजजवळ तोरणे
हलकाच स्पर्श ओलसर, दु:खाचे निखारे
कोमेजलेला गंध, झिजलेला वृ़क्ष
ओघळणारे मेघतांडव नेत्रात लुप्त
ना दिशा, ना आकार ना झंकार माहित
भिजल्या डोळ्यासही ना काही वाटले
------ शब्दमेघ
प्रतिक्रिया
23 Aug 2012 - 10:03 pm | प्रचेतस
बर्याच दिवसांनी लिहिलंस, छान लिहिलंस.
विषण्ण करणारं लिहिलंस.
23 Aug 2012 - 10:31 pm | अत्रुप्त आत्मा
+१
23 Aug 2012 - 11:06 pm | जाई.
+२
असेच म्हणते
23 Aug 2012 - 10:04 pm | मदनबाण
छान...
23 Aug 2012 - 10:28 pm | पैसा
छान लिहिलंस!
24 Aug 2012 - 3:07 am | रेवती
कविता आवडली.
24 Aug 2012 - 7:28 am | किसन शिंदे
कविता आवडली.
24 Aug 2012 - 9:15 pm | पक पक पक
लय भारी रे...
24 Aug 2012 - 9:22 pm | शैलेन्द्र
आवडलं..
"ना दिशा, ना आकार ना झंकार माहित
ओठांत अव्यक्त शब्द अडकले सगळे"
सुंदर..
24 Aug 2012 - 9:26 pm | सूड
छान लिहीलंय.