चंद्र फुलांचे हार गळा
रात्र सजविशी अंग-कळा || धृ. ||
धुंद धुंद मन, बहर-बंध तन
स्पर्श रेशमी, घुसमटतो घन
छेड काढता, लटक्या रागे
म्हणसी मजला 'कृष्ण-काळा'! || १ ||
देह उमलले, मिठीत रमले
श्वास केतकी, गुंफून पडले
रात्री मधुनी, कळीकाळाच्या
रंगला हा रास खुळा || २ ||
एकतनूता, एकतानता,
द्वैत मिटले, दोघांकरता
आसक्तीच्या मैफिलीत ह्या
जीव भोगे ब्रह्म-कळा || ३ ||
-पूर्वप्रकाशित
प्रतिक्रिया
2 Aug 2012 - 5:11 am | स्पंदना
एकतनूता, एकतानता,
द्वैत मिटले, दोघांकरता
आसक्तीच्या मैफिलीत ह्या
जीव भोगे ब्रह्म-कळा
लव्हली!!
देहाहुनही मुक्त भावना
शरणागत बापुडी...
2 Aug 2012 - 9:15 am | यशोधरा
सुरेख!
2 Aug 2012 - 11:34 am | मी_आहे_ना
मस्त
2 Aug 2012 - 12:27 pm | प्यारे१
छानच!
2 Aug 2012 - 12:49 pm | नगरीनिरंजन
सुरेख!
2 Aug 2012 - 3:38 pm | मेघवेडा
व्वा!
"कृष्ण-काळा" येथे श्लेष खुलून आला असता असं वाटून गेलं. कविता उत्तमच. :)
2 Aug 2012 - 7:58 pm | यशोधरा
आहे की :) की नाही?
3 Aug 2012 - 12:06 am | चिगो
मस्त कविता..
3 Aug 2012 - 12:06 am | चिगो
मस्त कविता..
3 Aug 2012 - 12:09 am | अन्या दातार
बहुदा पहिलीच कळण्यासारखी कविता. म्हणून विशेष कौतुक वाटले :)
3 Aug 2012 - 12:15 am | संजय क्षीरसागर
असं काही तरी लिहा ना राव!
3 Aug 2012 - 4:35 pm | मनीषा
सुरेख कविता..