नवव्यांदा बोहल्यावर।
लोकशाहीची भेळ।
सारा संख्येचा खेळ।
मुख्यमंत्री।।
विरोधकांना फोडा।
भाजपा टाकी गळ।
असो विरोधी गरळ।
मोठा मासा।।
नवल करीती लोक।
कधी शिवतो सूट?
शपथ घे ऊठसूट।
दर्जी म्हणे।
पाहोन ह्याचा रंगबदल।
लाजला तो सरडा।
लाल हिरवा करडा।
सोय जशी।।
महाराष्ट्री उध्वस्त 'यू-टर्न'।
आहे खातो मनी मांडे।
ताकाला जाऊनही भांडे।
लपवतो।।
कसली मूल्ये तत्वे?
झोक्यांचा सम्राट।
पुन्हा मांडी खाट।
भाजपाशी ।।
गुलजार हसे नितीश ।
लाजायचे काय काम।
म्हणे तो पलटूराम।
अखंडसत्तावती।।
काव्यरस
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1941
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मस्त
मस्त !!
व्वाह