ग़ज़ल
मेरे हर दर्द को मेहसूस किया है मैंने, ना पूछ कीसीको क़्या पाया हे मैंने
मेरे इतनि सी हँसी को झूठा नक़ाब पहनाया हे मैंने, ना समज कहीं गवाया है मैंने
मेरे चंद अश्कों का सौदा करलिया है मैंने, तन्हाई में जीना सीख लिया है मैंने
मेरे टूटें भरोसें के कातिल को जाना है मैंने, उफ़ तक करना भुला दिया है मैंने
मेरे हिस्सें की छाँव छोड़ दी है मैंने, धुप के थपेड़ों कों पीना शुरू किया है मैंने
मेरे ख़यालों की नैया जबसे ठानी है मैंने, कलम के सहारें चलते रेहना है मैंने
मेरे हौंसलें कों बुलंद किया है मैंने, गिर के भी फिर से ख़ुद को संभाला है मैंने
कवी - स्वप्ना
कविता आवडली...
वाह!
जबरी
भारीय.
In reply to भारीय. by सूड
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In reply to भारीय. by सूड
धन्यवाद देवा ! इथे मला बदल
अत्युत्तम भाऊराया!
In reply to अत्युत्तम भाऊराया! by राघव
धन्यवाद भाऊ !
In reply to अत्युत्तम भाऊराया! by राघव
+१
जबरदस्त!!! खुप आवडली.
मस्त!
भारी लिहिलेय !
मनःपूर्वक आभार मंडळी !
सुरेख! खूप दिवसांनी तुमची
आवडली...
धन्यवाद संपादक मंडळी !
बरेच दिवस अनुपस्थित
In reply to बरेच दिवस अनुपस्थित by नाखु
अलिकडे एकंदरीतच इंतरनेटवरील
छान गझल!
वा छान
वा छान
उत्तम रचना
धन्यवाद मंडळी ! मनःपूर्वक
येथे अतर्क्य सगळे निष्कर्ष
छान.
धन्यवाद !
धन्यवाद !
मस्त !!