< < मजबुरी है > >
हमारे दोस्तने हिंदीमे एक कविता क्या लिखी सब लोग उसका लैच कौतुक करने लगे. मेरी तो बहोत म्हणजे बहोत जलने लगी. एकदम चुलके वल्ले लकडीकी माफिक मै धुमसने लगा. बहोत धुवा निकालनेके बाद मैने सोच्या अगर वो लिख सकता है तो मै क्यो नही? फिर क्या..... निकाली अपनी पाचवी की पुस्तक और लिख डालीच ये कविता.
क्या करु मजबुरी है ना…..
ठहेरे हुए पानी मे
तैरते डुबते भैस की तरह
होता है तेरा शॉपिंग
कहेने को तो भैस पानी को
कभी पिती तो नही
बस पानी मी डुबती हुई
तैरती रहेती है
जैसे तू
कोई खयाल मेरे दिमाग की सतह को
छुने के पहेले, बडी तेजी से,
मेरे जेब मे रक्खे
मेरे वॅलेट तक पहोच जाती हो
तेरा यही हुनर
मुझे क्रेडीट कार्ड के बील
इन्स्टॉलमेंट पे चुकाने के लिये
मजबुर कर देता है
खर्चा करते रहेना
तेरी मजबुरी है
कार्ड चालु रखना
मेरी मजबुरी है
||||||घुसळलेले ताकप्रेमी|||||||||
(३१-२-१८५७)
(तळाचिप्सः- ए भाय…. अभी इसकाभी टिरांसलेशन कर दो भाय…)
:)
पांदीत जम्लेल्या पान्यामदी
=))
लैच जब्रा.
जबरी!=))
हेहेहेहे...जबरी रे अभ्या!
क्विता लै भारी ! भाषांतर पन
सुरेख...
हा हा मस्त !
जबर्या
दणक्यात्त्त्त्त्त !
झिंगाट भाषांतर !!
अभ्या एकदम जबराट!!!
हा हा हा हा.... महान लोक
द्येवा
.
.
झाले झाले. त्रिवार दंडवताने
क्या बात है
हाहाहा!
=))
अरे काय हे...
:-)
=))
खी खी खी :)
=)) =)) =))
:) :) :)
=))
=)) =))
=)))))
रच्याकने,
पैजाराबुवा
हे हे हे हे!
:) मस्त
:)
=))
हाहाहा;
=))
भारीच राव!!