हसरतों का ज़नाज़ा..!
हसरतों का ज़नाज़ा...!
लुटा रही थी खुशियाँ,
मैं तो सारे जहाँ में,
सौगात कोई गम की,
मुझें भीख दे गया ।
हसरतों का मेरी, ज़नाज़ा निकल गया..
दिल की मुराद लिखने,
बैठी थी नाजुक कलम से,
बेवफ़ाई की स्याही,
कोई उनपे गिरा गया ।
हसरतों का मेरी, ज़नाज़ा निकल गया..
लिखे थे मैंने इम्तेहाँ,
बड़े लगनों-इमान से,
सफ़ल उन्हीं में मगर,
कोई गैर हो गया ।
हसरतों का मेरी, ज़नाज़ा निकल गया..
जुड़ी थी साँसे जिनसे,
मेरी ही जिंदगी की,
चुराके मुझसे उनको,
कोई मौत दे गया ।
हसरतों का मेरी, ज़नाज़ा निकल गया..
मुझे मुहब्बत थी जिनसे,
जाँ से भी ज्यादा,
वो शख्स भी तो मुझसे,
रुठकर चला गया ।
हसरतों का मेरी, ज़नाज़ा निकल गया..
मिलने से मेरी जिसके,
जिंदगी सँवर गई थी,
एक दिन अचानक उसे,
कोई और मिल गया ।
हसरतों का मेरी, ज़नाज़ा निकल गया..
अरमाँ थे बड़े ही मुझको,
उनकी ही बंदगी के,
झोंका एक हवा का,
उन्हें भी बिखेर गया ।
हसरतों का मेरी, ज़नाज़ा निकल गया..
आशियाँ मेरा किया था,
जिसने रोशन,
चिराग वही एकदिन,
उसको जला गया ।
हसरतों का मेरी, ज़नाज़ा निकल गया..
पलकों का बिछाके दामन,
मिली थी खुशियाँ जिससे,
आँखें फेर अब वो,
मुझसे दामन छ़ुड़ा गया ।
हसरतों का मेरी, ज़नाज़ा निकल गया..
पागल थी प्यार में जिसके,
सुदबुध भी खो गई थी,
ठुकरा के मुझको वही,
बिरहन बना गया ।
हसरतों का मेरी, ज़नाज़ा निकल गया..
ऐसे ही ख्वाईशों की बस्ती,
विरान हो गई,
हर तमन्ना मेरी सपनों में सिमट गई,
हस्ती को मेरी मिटाकर,
वो सुपुर्दे खाक कर गया ।
हसरतों का मेरी, ज़नाज़ा निकल गया....
जयगंधा..
२७-९ २०२०.
मराठीचा जनाजा
२५ ऑक्टोबर २०२० रोजी,
वाह वाह...
२५ ऑक्टोबर २०२० रोजी,
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वा...
वाह छान लिहीलय ,जयगंधा ....आवडलं
छान लिहिलय,जयगंधा, आवडलं
छान लिहिलय,जयगंधा, आवडलं
जुड़ी थी साँसे जिनसे,
धन्यवाद